Thoughts of Mahatma Gandhi

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  • अनासक्ति कितनी कठिन है अनुभवसे ही पता चलता है ।

    न[ई] दि[ल्ली] रवी, २२ सितम्बर १९४६ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड ८५, पृ. ४९४
  • आपखुदीमें सब मुसीबत भरी है ।

    न[ई] दि[ल्ली] सोम, २३ सितम्बर १९४६ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड ८५, पृ. ४९४
  • विचारशून्य जीवन पशु जीवन जैसा है ।

    न[ई] दि[ल्ली] मंगल, २४ सितम्बर १९४६ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड ८५, पृ. ४९४
  • जिसको जम पहोंचना चाहते हैं करीब २ उसके जैसा हमारे [हमें] बनना है ।

    न[ई] दि[ल्ली] बुध, २५ सितम्बर १९४६ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड ८५, पृ. ४९४
  • अगर तुझे चिढ़ना है तो दूसरोंकी गफलतसे क्यों, अपनी गफलतपर चिढ़ ।

    न[ई] दि[ल्ली] गुरु, २६ सितम्बर १९४६ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड ८५, पृ. ४९४
  • हार्दिक श्रद्धा और श्रद्धाकी इच्छामें बड़ा अंतर है । यह नहीं जानने से आदमी धोकेमें पड़ता है ।

    न[ई] दि[ल्ली] २७ सितम्बर १९४६ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड ८५, पृ. ४९४
  • भौतिक ज्ञान सबके नसीबमें नहीं है । आत्म ज्ञान सब पा सकते हैं, पाने का सबका धर्म है ।

    न[ई] दि[ल्ली] २८ सितम्बर १९४६ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड ८५, पृ. ४९४
  • जो ईश्वर चतुर्भुज है वह सहस्त्र भुज भी होता है । येह बताता है कि सब काल्पनिक है ।

    न[ई] दि[ल्ली] रवि, २९३० सितम्बर १९४६ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड ८५, पृ. ४९४
  • गंदे ख्यालका विचार करने से वे हेट नहीं लेकिन उसका संग पैसा होने का सभव [संभव] है ध्यायविषयान् ।

    न[ई] दि[ल्ली] सोम, ३० सितम्बर १९४६ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड ८५, पृ. ४९४
  • सीधी और सो हिस्सा सच्ची बात तो यह है कि सिवाय रामनामके और विचार न करें तो सब विचार अपने आप ठीक होते हैं और सब कम भी ।

    न[ई] दि[ल्ली] मंगल, १ अक्तूबर १९४६ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय खण्ड ८५, पृ. ४९५
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